भारत पर मुस्लिम आक्रमण

muslim aakraman in india


भारत पर मुसलमानों ने तीन आक्रमण ने भारत के सामाजिक राजनीतिक तथा आर्थिक परिवर्तन ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।

  • अरबों का आक्रमण
  • मोहम्मद गजनी का आक्रमण
  • मोहम्मद गौरी का आक्रमण 

अरबों का आक्रमण

आठवीं शताब्दी के शुरुआत में अरब का शासक अल -हज्जाज था उसका भतीजा तथा दामाद मोहम्मद बिन कासिम था इस समय सिंध का राजा दाहिर का शासन था। अतः अल हज्जाज ने यह बहाना बनाते हुए दहिर को कहा कि उसके सामने से भरी जहाज देवल बंदरगाह को लूट लिए गए हैं। देवल सिंधु नदी के मुहाने पर स्थित एक बंदरगाह था । इसका जवाब देते हुए दाहिर ने कहा कि देवल का क्षेत्र मेरे राज्य के अंतर्गत नहीं आता है। अतः जहाज को लूटने वालों को दंड नहीं दे सकता इस पर क्रोध होकर अलहाज ने अपने भतीजे,दामाद मोहम्मद बिन कासिम को सिंध राज्य पर आक्रमण के लिए भेजा। मोहम्मद कासिम ने 712 ईसवी में सिंध पर आक्रमण किया। सिंध राज्य में बौद्ध भिक्षु की संख्या अधिक थी। उसने संबंध दाहिर के संबंध अच्छे नहीं थे। अतः बौद्ध भिक्षुओं ने मोहम्मद बिन कासिम का साथ दिया। अतः इस युद्ध में मोहम्मद बिन कासिम की जीत हुई और दाहिर हार गया और सिंधी राज्य पर अरबों का आधिपत्य हो गया।


मोहम्मद बिन कासिम भारत पर आक्रमण करने वाला पहला मुसलमान था । मोहम्मद बिन कासिम अरब के आक्रमण तथा सिंध क्षेत्र में साम्राज्य निर्माण का प्रभाव भारत में निम्न रूप से पड़ा।

  • भारत के लोग पहली बार जजिया कर से परिचित हुए जजिया कर गैर मुसलमानों पर लगाया कर था। 

  • भारत में सबसे पहले जजिया कर मोहम्मद बिन कासिम ने लगाया था।

  • भारत में सर्वप्रथम ऊंट पालन का विकास हुआ था।

  • भारत के लोग खजूर की खेती करने लगे।

इस हमले ने अरब जगत को भी प्रभावित किया। भारत के रामायण महाभारत आदि ग्रंथों को अरबी भारत ले गए तथा इसका अनुवाद अरबी फारसी में करवाए।

अरबों का भारत पर आक्रमण का वर्णन चचनामा नामक पुस्तक में मिलता है।

अल्पगतीन एक तुर्क मुसलमान था वह यामिनी वंश का था। उसने अफगानिस्तान के गजनी क्षेत्र में एक राज्य की स्थापना की थी। 

अल्पगतीन का पुत्र सुबक्त्गीन था । सुबक्त्गीन ने हिंदू साईं राज्य के शासक जयपाल पर हमला किया था। जयपाल पर किया गया हमला तुर्को द्वारा भारत पर किया जाने वाला पहला हमला था । सुबक्त्गीन का पुत्र मोहम्मद गजनी था ।


मोहम्मद गजनी महत्वाकांक्षी था वह अपने क्षेत्र में एक बड़ा साम्राज्य स्थापना करना चाहता था। इसके लिए उसे धन की आवश्यकता थी। अतः मोहम्मद गजनी ने भारत पर 17 बार आक्रमण किया।

                         इतिहासकारों के अनुसार इसके बगदाद के खलीफा कादिर बिल्लाह के सामने संकल्प लिया था कि वह भारत पर प्रतिवर्ष आक्रमण करेगा इससे खुश होकर मोहम्मद गजनी को यामीन -उददौला (इस्लाम का दाहिना हाथ) यामिनी- उह -मिल्लाह (मुसलमान का संरक्षण) उपाधि दी थी। मोहम्मद गजनवी के भारत मेें आक्रमण के तीन महत्वपूर्ण कारण थे।

  • भारत से धान लूटना
  • प्रसिद्धी हासिल करना
  • इस्लाम का प्रचार करना

मोहम्मद गजनी विद्वानों का संरक्षक था उस के दरबार में निम्नलिखित प्रमुख विद्वान थे।

अलबरूनी

यह मोहम्मद गजनी के साथ भारत आया था इसने अरबी भाषा में किताबुल - हिंद या तारीखे -हिन्द नामक पुस्तक की रचना की।अलबरूनी पहला मुसलमान था जो पुराण का अध्ययन किया था।

उत्बी

उत्वी मोहम्मद गजनी का दरबारी इतिहासकार था। इसकी पुस्तक है । तारीख -ए -यामिनी या किताब -उल -यामिनी।

फिरदौसी

फिरदौसी फारसी भाषा में लिखने वाला विद्वान था। उसने फारसी भाषा की प्रथम पुस्तक शाहनामा लिखि । फिरदौसी की फारसी भाषा का जन्मदाता कहा जाता है।


महमूद गजनी ने 1001 से 1027 के बिच 17 बार भारत पर आक्रमण किया। इसके कुछ प्रमुख आक्रमण निम्नलिखित है।

  1.  पेशावर पर आक्रमण :-  पेशावर का हिंद साईं राजा जयपाल था मोहम्मद गजनी ने पेशावर पर हमला कर राजा जयपाल को हरा दिया जयपाल ने आनंदपाल को गद्दी पर बैठा कर खुद आत्महत्या कर लिया । पेशावर पर आक्रमण गजनी का पहला आक्रमण था।
  2. भटिंडा पर आक्रमण :-  1004 ईस्वी में गजनी ने पंजाब के भटिंडा राज्य पर आक्रमण किया तथा वहां के राजा को पराजित किया।
  3. वैहिन्द का आक्रमण :-  1009 विश्व मोहम्मद गजनी ने वहिन्द पर आक्रमण किया और वहां के राजा को हराया।
  4. कन्नौज पर आक्रमण :-  1018 में गजनी ने कन्नौज पर आक्रमण किया तथा वहां के राजा को हराया।
  5. सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण :-  गुजरात के सोमनाथ मंदिर एक प्रसिद्ध शिव मंदिर था । यह मंदिर धन से भरा पड़ा था ।मोहम्मद गजनवी 1125 ईसवी में सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण किया । इस मंदिर को उसने पूरी तरह से लूटा। मंदिर तथा मूर्ति तोड़फोड़ कर हानि पहुंचाई।
  6. जाटों पर आक्रमण :-  भारत के उत्तर पश्चिम भाग में जाटों का निवास था। जब सोमनाथ मंदिर को लूट कर मुहम्मद गजनी वापस लौट रहा था तो इस जाटों ने इस पर बाधा उत्पन्न किया था। इससे क्रोधित होकर 1127 में मोहम्मद गजनी ने जाटों पर हमला किया, और इसे हराया जाटों पर किया गया हमला मोहम्मद गजनी के द्वारा अंतिम हमला था।   

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-सतनामा के लेखक फिरदोसी पूर्व का होमर कहा जाता है। होमर यूनान का कवि था इसके 2 पुस्तकें प्रसिद्ध है ।

इलियाड और ओडैशी

-मोहम्मद गजनी द्वारा 1025 में सोमनाथ मंदिर को हानि पहुंचाई गई थी 1026 ईसवी में चालूक्य वंश का राजा भीम पाल (भिम-। ) 1775 में अहिल्याबाई होलकर ने तथा 1950 में पटेल नें इसकी मरम्मत करवाई I


- यामिनी वंश (गजनी) वंश का अंतिम शासक खुसरो मलिक था। खुसरो मालिक को मोहम्मद गौरी ने 1192 ई. में कैद कर मार डाला तथा गजनी को अपने राज्य में मिला लिया।


महमूद गजनी का पुत्र सुल्तान महमूद था।


        

इसका असली नाम मौजूददीन मोहम्मद बिन शाम था। 

1.मुल्तान पर आक्रमण

मुल्तान पाकिस्तान में एक छोटा सा राज्य था 1175 इसमें में मोहम्मद गौरी ने मुल्तान पर आक्रमण कियाI इसने मुल्तान के कर्ममाथी शासक को हराया। मुल्तान पर किया गया हमला मोहम्मद गौरी का भारत पर पहला आक्रमण था।

2.दूसरा आक्रमण

मोहम्मद गोरी ने 1178 ई. में गुजरात पर आक्रमण किया। इस समय गुजरात का मूलराज द्वितीय था । मूलराज द्वितीय ने गौरी को बुरी तरह पराजित किया था

3.तबरहिन्द पर आक्रमण

तबरहिंद पाकिस्तान का एक छोटा सा राज्य था मोहम्मद गोरी ने 1180 से 1190 के बीच उस पर हमला कर उसके शासक को पराजित किया ।

4.तराईन का प्रथम युद्ध

1191 में मोहम्मद गौरी ने अजमेर पर आक्रमण किया अजमेर पृथ्वीराज चौहान तृतीय की राजधानी थी और मोहम्मद गौरी तथा पृथ्वीराज चौहान तृतीय के बीच तराइन का प्रथम युद्ध हुआ इसमें पृथ्वीराज चौहान की जीत हुई।

5.तराइन का द्वितीय युद्ध

मोहम्मद गौरी ने विमान -उल -मुल्क को पृथ्वीराज चौहान के दरबार में अपने इस संदेश के साथ भेजा की। पृथ्वीराज चौहान इसका अधीनता स्वीकार कर ले पृथ्वीराज चौहान इसके अधीनता स्वीकार नहीं करता है। 1192 ई. में दोनों के बीच युद्ध होता है इसमें मोहम्मद गौरी की जीत हुई और पृथ्वीराज चौहान बंधी बना लिया गया तथा मार दिया गया।

मोहम्मद गौरी के सेना से पृथ्वीराज चौहान से लड़ने वाला सेनापति खंडेराव था।

हसन इमाम की पुस्तक ताजुलनर्सरी से भी पृथ्वीराज चौहान तथा गौरी के संबंध में जानकारी मिलते हैं।

तराइन का द्वितीय युद्ध भारतीय इतिहास का निर्णायक युद्ध माना जाता है क्योंकि इस युद्ध में गोरी ने पृथ्वीराज चौहान को हराया था। जो उत्तर पश्चिम का सबसे बड़ा राजा था इस हार के बाद उत्तर पश्चिम भारत में मोहम्मद गोरी ने तुर्क शासक की स्थापना की।

नोट

भारत में तुर्की शासक का स्थापित करने का श्रेय मोहम्मद गौरी को जाता है।

6.कन्नौज पर आक्रमण

इस समय कन्नौज के राजा जयचंद था वह गढ़वाड वंश का था जयचंद तथा मोहम्मद गौरी के बीच 1194 ई . में चंदावर का युद्ध हुआ इस युद्ध में जयचंद्र की हार हुई।

नोट -

  • मोहम्मद गौरी के सिक्के पर एक ओर काली मां तथा दूसरी और लक्ष्मी के चित्र बने मिलते हैं
  • सूफी संत मोइनुद्दीन चिश्ती मोहम्मद गोरी के साथ 1192 ई. में तराइन के द्वितीय युद्ध के समय भारत आया तथा वह अजमेर में बश गया।
  • भारत में एकता प्रथा का शुरुआत करने वाला मोहम्मद गौरी था। परंतु इल्तुतमिश ने इक्ता प्रथा को संस्थागत रूप दिया। 1206ई. में मोहम्मद गौरी की मृत्यु हो गई इसकी हत्या उत्तर पश्चिम के खोखरो एंव जाटों ने उसकी हत्या कर दी।

सिंधु घाटी सभ्यता के पतन के कारण


सिंधु घाटी सभ्यता के पतन 1750 ईस्वी आते-आते सिंधु घाटी सभ्यता के पतन के साक्ष्य मिलने लगते हैं सिंधु घाटी सभ्यता का पतन हुआ था नष्ट नहीं हुआ था इतिहासकार इस के पतन के निम्नलिखित कारण बताते हैं ।

सिंधु घाटी सभ्यता के नगर नदीयों के किनारे बसे हुए थे अतः बाढ़ आने से ये डूब गया

भूकंप आने से
जलवायु परिवर्तन
भूखमरी से
आग लगने से /आदि

परंतु वर्तमान का इतिहास यह मानते हैं कि सिंधु घाटी सभ्यता का पतन प्रस्थिक असंतुलन के कारण हुआ था।

सिंधु घाटी सभ्यता का पतन हुआ था यह नष्ट नहीं हुई थी जब मध्य एशिया से आए तभी सिंधु सभ्यता के लोग भारत के पश्चिम उत्तर भाग में निवास कर रहे थे।

आर्यों ने इन्हें अनार्य कहां पहले आर्य एवं अनार्य के बीच टकराहट दिखती हैं परंतु धीरे-धीरे आर्य तथा अनार्य को सभ्यता और संस्कृति मिश्रित हो गई ।

सिंधु सभ्यता की अर्थव्यवस्था समाज और धर्म का वर्णन करें

सिंधु घाटी सभ्यता में अर्थव्यवस्था का आधार निम्नलिखित था।
  1. कृषि
  2.  पशुपालन 
  3. व्यापार 
  4. शिल्पा

          सिंधु घाटी सभ्यता में कृषि

सिंधु घाटी सभ्यता से 9 प्रकार के फसलों का साक्ष्य मिलते हैं चावल, गेहूं, मटर, खरबूज, कपास, खजूर, बांसीका, जूँसी, दो किस्म के जाव मिलते हैं। चावल के साथ साक्ष्य लोथल से मिलता है। 

सिंधु घाटी सभ्यता के लोग विश्व में सबसे पहले कपास की खेती करना शुरू किए थे मेहरगढ़ से कपास का साक्ष्य मिलता है। 

सिंधु घाटी सभ्यता के लोग खेतों को जोत कर कृषि कार्य किया करते थे कालीबंगा से जूते हुए खेत के साक्ष्य तथा वनवाली से मिट्टी के बने हुए हल के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं सिंधु घाटी सभ्यता के लोग नदियों के द्वारा खेती की सिंचाई करते थे परंतु कहीं नहाने के भी साक्ष्य मिले हैं जो कि धोलावीरा से बेहतर जल प्रबंधन के साथ मिले है।

         सिंधु घाटी सभ्यता में पशुपालन

इस सभ्यता में गोबर बैल गाय बकरी सूअर आदि को पालतू बना रखा था इस सभ्यता को लोग अभी घोड़ा से परिचित नहीं थे ।

         सिंधु घाटी सभ्यता में व्यापार

सिंधु घाटी सभ्यता के लोग आंतरिक तथा अंतरराष्ट्रीय व्यापार किया करते थे इनके व्यापार जो होते थे फारस (ईरान) तथा मेसोपोटामिया (इराक) से होता था अफगानिस्तान से वदाख्शॉ से इस सभ्यता के लोग लाजवर्त नामक पत्थर का आयात करते थे।

       सिंधु घाटी सभ्यता में शिल्प

सिंधु घाटी सभ्यता के लोग तांबा, पीतल, कासा सोना,चांदी से परिचित थे इन्हें गलाकर सांचे में ढालने जानते थे इस पद्धति के द्वारा वे मूर्तियॉ बनाया करते थे।मोहनजोदारो से काशो की नर्तकी के साक्ष्य मिले हैं ।

इस सभ्यता के लोग सेलखड़ी की मुहरे बनाना जानते थे उनके मुहावरे आयताकार होती थी परंतु लोथल में जो फारस के मोहरे मिले हैं वह गोलाकार होते हैं
सिंधु घाटी सभ्यता के लोग लोहे से परिचित नहीं थे । 

सिंधु घाटी सभ्यता का धर्म

सिंधु घाटी सभ्यता के लोग मातृदेवी की पूजा करते थे मातृदेवी कई मिट्टी की मूर्तियां इस सभ्यता के स्थलो से प्राप्त हुए हैं।

मोहनजोदड़ो से एक पत्थर के योगी के मूर्ति मिली हैं इसके दाई ओर चीता तथा हाथी बाई और गेंडा तथा भैसा के चित्र मिलते हैं इतिहासकार पशुपति शिव की मूर्ति मानते हैं इस सभ्यता के कई स्थलों से कुबड वाला बैल वृषण मिला है। इस शुभ माना जाता है।

पीपल के वृक्ष तथा एक सिंह वाला पशु की भी पूजा की जाती है इस सभ्यता के लोग ताबीज धारण करते थे तथा उन्हें भूत प्रेत में इनका विश्वास था ।
सिंधु घाटी सभ्यता का समाज

इस सभ्यता का समाज 4 नगरों में विभाजित था
(i) योद्व
(ii) व्यापारी 
(iii) विद्वान 
(iv) कामगार

वैदिक काल के चार वर्ण ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य तथा क्षेत्र के बीच सिंधु घाटी सभ्यता में दिखते हैं ।
इस सभ्यता में सबसे अच्छे स्थिति व्यापारियों के थी वह धनी थे तथा राज्य कार्य की जिम्मेदारी व्यापारियों के हाथों में थी।

व्यापारी के आवास नगरों के पश्चिम टीला पर स्थित दुर्ग या टीला में मिलते हैं।

इस सभ्यता में स्त्रियों की स्थिति अच्छी थी इस सभ्यता का समाज मातृसत्तात्मक समाज था स्त्रीयॉ प्रायः घाघरा पहनती थी तथा आभूषण से लदी रहती थी पुरुष भी आभूषण प्रेमी थे वे शतरंज तथा पासे का खेल खेला करते थे।

इस सभ्यता के लोग शव को दफनाने और जलाने जानते थे।

सिंधु घाटी सभ्यता के माप तौल

इस सभ्यता के लोग वस्तु को मापना तथा तौलना जानते थे वस्तुओं को तौलने के लिए तराजू तथा वाट का प्रयोग करते थे मोहनजोदड़ो से तराजू के साक्ष्य मिलते हैं
वॉट 16 के गुणों से बनाए जाते थे जैसे -16,32,48,64 आदी

वस्तु को मापने के लिए स्केल का प्रयोग किया करते थे इसके स्केल घन तथा फुट पर आधारित होते थे। गुजरात के लोथल से तांबे के स्केल मिले हैं ।



सिंधु घाटी सभ्यता के कला एवं नगर योजना

सिंधु घाटी सभ्यता के लोग सेलखड़ी की मोहर बनाने की कला जानते थे । इन मोहर पर भाव चित्रात्मक लिपि में लिखे हुए लेख मिलते हैं इस लिपि के 64 मूल चिन्ह थे इन्ही मूल्य चिन्हों के आधार पर इस सिंधु सभ्यता के लोग भाव चित्रात्मक लिपि में लेख लिखा करते थे । यह लिपि दाएं से बाएं लिखी जाती थी इसके मुहरो पर पशु तथा पक्षियों के चित्र बने होते थे उनके मोहरे पर एक सीधी साड के चित्र बड़ी संख्या में देखने को मिलते है ।
मोहनजोदड़ो से मिले मुहरों पर पशुपति शिव के चित्र मिलते हैं ।
मोहनजोदारो  तथा लोथल के मोहरे पर नाव के चित्र मिलते हैं इसका तात्पर्य है कि भारत के लोग सागरीय व्यापार तथा अंतरराष्ट्रीय व्यापार किसी दूसरे देशों के साथ था ।

कालीबांग, मोहनजोदारो तथा लोथल से राज्य मुद्रक मिलता है इसका प्रयोग व्यापार की वस्तुओं पर चिन्ह ( ठप्पा ) लगाने के लिए किया जाता था।
सिंधु घाटी सभ्यता के लोग मिट्टी के मूर्ति, धातु की मूर्ति तथा पत्थरों की मूर्तियां बनाने जानते थे ।मोहनजोदड़ो से कासे नर्तकी की मूर्तियां मिलती है ।

मोहनजोदड़ो से पत्थर की एक ऐसी मूर्ति मिलती है जिसकी दाढ़ी तो है परंतु मुझे नहीं है तथा बाल बड़े -बड़े हैं तथा जोड़े से बंधे हुए हैं उसकी आंखें आधी खुली हुई है इतिहासकार इसे सन्यासी या योगी या पुरोहित की मूर्ति मानते हैं ।

मोहनजोदड़ो से बिना सिर के नग्न पत्थर के दो मूर्तियां मिलते हैं जो कि बिना वस्त्र हीन है ।मोहनजोदारो से एक ऐसी पशु की पत्थर की मूर्ति मिलती है जिसका शरीर भेड़ जैसा तथा सिर हाथी जैसा है इतिहासकार मानते हैं कि इस मूर्ति का कोई धार्मिक महत्व रहा होगा ।

सिंधु घाटी सभ्यता की नगर योजना

सिंधु घाटी सभ्यता एक नगरिय सभ्यता थी यहां के लोगों को नियोजन के द्वारा बसाया गया था।


इस नगर की निम्नलिखित विशेषताएं थी

(i)  इस सभ्यता की सबसे प्रमुख विशेषताएं इसकी सड़क योजना है सड़के एक दूसरों के समकोण पर करती थी।

(ii) सड़क के दोनों किनारों पर मकान बने हुए थे मकान के बीच आगन होते थे । तथा आंगन के चारों तरफ कमरे होते थे पर एक मकान में स्नान करने का एक स्नानघर होता था तथा रसोईघर भी होता था । 

(iii) सिंधु घाटी सभ्यता प्रायः मकान कच्ची ईंटों से बने बनाए गए होते थे परंतु मोहनजोदारो के मकानों में पक्की ईंटों का प्रयोग किया गया था।

(iv) सड़कों के किनारे समांतर नदिया बनाई गई थी नदियों में पक्की ईंटों का प्रयोग किया जाता था । मकानों की खिड़कियों ऊंचाई पर लगाई जाती थी तथा दरवाजे में लकड़ी की किवाड़ बने होते थे ।







यंग बंगाल आंदोलन

यंग बंगाल आंदोलन के संस्थापक हेनरी विवियन 
डेरोजियो थे वे एक एग्लो इंडियन थे इनका जन्म 1809 ईसवी में कोलकाता के हुआ था वह कम उम्र में ही कोलकाता के हिंदू कॉलेज के प्रोफेसर हो गए थे वें 1789 ई. के फ्रांस की क्रांति से प्रभावित थे उन्होंने अपने शिष्यों को स्वतंत्र तरीके से सोचेने, समानता तथा बंधुता के पाठ पढ़ाया था । देखते-देखते बंगाल के युवा इनसे विचारों से आकर्षित हुए और यंग बंगाल आंदोलन की शुरुआत हो गई थी उन्होंने बंगाल में कई डिवेंटीका क्लब की स्थापना की थी वे वेस्ट इंडिया नामक पत्रिका का संपादन करते थे ।

हेनरी विवियन डेरोजियो को भारत का प्रथम राष्ट्रवादी कवि कहा जाता है 1831 ईसवी में हैजा के कारण इसकी मृत्यु हो गई ।




रामकृष्ण मिशन की स्थापना किसने की थी

राम कृष्ण का जन्म 1834 ईसवी बंगाल के एक छोटे से गांव में हुआ था कम उम्र में ही उनका विवाह श्रद्धामनी से हुई थी यह भारतीय विचार एवं संस्कृति में गहरी आस्था रखते थे वे सभी धर्मों के सत्य मानते थे वें मूर्ति पूजा में विश्वास करते थे और यह मानते थे कि मूर्ति पूजा ईश्वर प्राप्ति का एक माध्यम है नरेंद्रनाथ दत्त इनके प्रिय शिष्य नरेंद्रनाथ दत्त ने रामकृष्ण के  शिक्षाओ का प्रसार किया । राम कृष्ण की मृत्यु 886 में हो गई थी ।
raamakrshn mishan kee sthaapana kisane kee thee

विवेकानंद

इनका बचपन का नाम नरेंद्र नाथ दत्ता भूपेंद्र नाथ दास विवेकानंद के बड़े भाई थे विवेकानंद के जन्म 1863 ईस्वी में बंगाल में हुआ था । उन्होंने वैदिक शिक्षा तथा भारतीय संस्कृति का विश्व में प्रसार किया । 1893 ईस्वी में यूएसए के शिकागो में होने वाले विश्व सम्मेलन संसद में विवेकानंद ने भाग लिया था। उन्होंने यह कहा कि पश्चिम के भौतिकवाद तथा पूर्व की आध्यात्मिकता के मिश्रण से एक नई मनुष्यता जन्म ले सकती है 1893 ईसवी से 1896 ईसवी तक विवेकानंद पश्चिम के देशों में वैदिक शिक्षा के प्रचार करते रहे 1896 ईस्वी में भारत लौटा तथा 1897 ईस्वी में कोलकाता के वेल्लूर मठ में रामकृष्ण मिशन की स्थापना की । इसकी स्थापना का मुख्य लक्ष्य मानव का सेवा करना था विवेकानंद के अनुसार ईश्वर के सच्ची पूजा मनवाता की सेवा के द्वारा ही की जा सकती है वह पक्के भक्त भी थे ।
सुभाष चंद्र बोस ने यह कहा था जहां तक बंगाल का संबंध है हम विवेकानंद को आधुनिक राष्ट्रीय आंदोलन का आध्यात्मिक पिता को सकते हैं 1902 ईसवी में विवेकानंद की मृत्यु हो जाती है ।

आर्य समाज के संस्थापक कौन हैं

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आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती थे इनका बचपन का नाम मूल शंकर था इनका जन्म गुजरात के कट्ठीवाड़ा जिले के मोरबी नामक गांव में हुआ था वह बचपन से ही अपना घर त्याग दियें और मथुरा आकर विरजानंद को अपना गुरु बना लिया था और उन्होंने वेदों को गंभीर रूप से अध्ययन किया और अध्यान करने के बाद यह निष्कर्ष निकाले कि वेंद ईश्वर ज्ञान से भरा पड़ा है इसलिए उन्होंने यह नारा दिया वेदों की ओर लौटो ।

दयानंद सरस्वती ने विरजानंद के प्रेणा से 1875 ईसवी में बंबई में आर्य समाज की स्थापना की थी इस समाज के द्वारा दयानंद ने मूर्ति, पूजा, कर्मकांड, छुआछूत, श्राद्ध कर्म, दहेज प्रथा आदि का विरोध किया था ।

दयानंद सरस्वती ने हिंदू धर्म को सर्वोपरि माना सर्व परी का मतलब सबसे ऊंचा माना । उसने शुद्धि आंदोलन चलाया शुद्धि आंदोलन इसलिए चढ़ाया गया था मुसलमान शासकों ने बड़ी संख्या में हिंदुओं को मुसलमान धर्म में परिवर्तित कर दिया गया था। अतः शुद्धि आंदोलन हिंदू धर्म में पून : लौटने का अवसर  प्रदान करता था ।

दयानंद सरस्वती ने अपने विचार को सत्यार्थ प्रकाश नामक पुस्तक में संकलित किया है ।
सत्यार्थ प्रकाश नामक संस्कृत भाषा में लिखी गई पुस्तक है । उन्होंने अंग्रेजी भाषा में चुनौती देते हुए यह कहा था कि अच्छे से अच्छा विदेशी शासन बुरे से बुरे देसी शासन से खराब होता है स्वदेशी और देशभक्ति के समर्थक थे । दयानंद सरस्वती ने स्वदेशी आंदोलन चलाया था ।

वैलेंटाइन शिरोल आर्य समाज दयानंद सरस्वती को भारतीय अशांति का जन्मदाता कहा जाता है|

दयानंद सरस्वती के तीन प्रबल समर्थक थे ।
(i) लाला लाजपत राय 
(ii) लाला हंसराज 
(iii) श्रद्धानंद

1886 ई. में दयानंद सरस्वती की मृत्यु हो गई उनकी मृत्यु के बाद आर्य समाज को दो भागों में विभाजित कर दिया गया ।

(1) वैसे लोग जो स्वदेशी शिक्षा के समर्थक थे ।
(2) वैसे लोग जो स्वदेशी शिक्षा के साथ-साथ पश्चात शिक्षा के भी समर्थक थे। श्रद्धानंद स्वदेशी शिक्षा के समर्थन थे। अतः उन्होंने पुणे से 2 ईसवी में हरिद्वार में गुरुकुल कांगड़ी की स्थापना की थी । हंसराज स्वदेशी के साथ-साथ पश्चात शिक्षा के भी समर्थक थे उन्होंने दयानंद एंग्लो वैदिक स्कूल (DAV) की स्थापना की थी।